Tuesday, April 22, 2008






Saturday, March 15, 2008

रिश्ता

उसको कुछ दूर तक,
निहारती
आँखों की नमी ने
बताया मुझको।
कि उस चेहरे से, इन आँखों का
रिश्ता क्या है .............

संक्रान्ति

संक्रान्ति : परिवर्तन की बेला,

ज्यों पौ फटी हो।

सुबह- सुबह, गंगा घाट को,

जाती हुई वो;

ठेले पे पति की की लाश को

लादे हुए।

बिखरे बाल, मानो बदहवास ; पर

आंखें सूखी;

आंसुओं को बहने का शायद

वक्त ना मिला।

साथ इक बच्ची भी है

तीन साल की;

समझ नही पाती है बिल्कुल

माँ की पीड़ा।

माँ के मुख को देख कर कुछ

बोलती नही;

पर आंखों मे इक चमक सी है

कुछ पूछती हुई;

आएगी कभी क्या जीवन में,

मेरे भी संक्रान्ति !

Monday, January 21, 2008

माना था खुदा जिनको हमने, अपनी ज़िंदगी का ;
बुत वो हैं बन गए और, हमको बनाया काफिर।

Monday, November 06, 2006

कल शाम रस्ते पे देखा, कुछ मैला सा कनवास;
रेशा - रेशा, ज्यों लम्हा- लम्हा, बुना हुआ करीने से।
रंगों के बीच की दरारें, भेद सारी सिल्वटों के।
दिल की कश्मकश उभर आयी है इन सिल्वटों में।

फेंका होगा आवेश में, उन्ही हाथों ने
जिनमे थमी कूची ने भरा था रंगों से इसे।
.... कुछ सुर्ख, ... तो कुछ स्याह.......

कोरों पे लगी कालिख़,
कुछ सालती है क्योंकर
दिन रात ये जपते हो
तमसो मा ज्योतिर्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय

Saturday, November 04, 2006

dhoop ayegi

सर्दी की एक सुबह
वीरान सूनी सड़कें
फुटपाथ पर ठंड से सिहरती
इक निर्बल सी काया

अख़बार के टुकडों को
लपेट कर
ठंड से बचने की
नाकाम कोशिश कर रही
खुद को दिलासा देती है।

सूर्योदय के इंतज़ार में
आसमान पर टिकी निगाहें
इक पल को चली जाती
गगनचुम्बी अट्टालिकाओं पर

महलों कि खिड़कियाँ
हमारे लिए बंद सही
पर सूर्य !!!
उसकी रौशनी तो
मेरे लिए भी है
मेरे लिए भी......

इसी इंतजार में पथराई निगाहें
एकटक देखतीं आसमां को
कभी तो सूर्य उगेगा
सवेरा होगा
धूप आएगी
धूप आयेगी..............